जीएसटी संग्रह में तेजी की वजह आयातित मुद्रा स्फीति है, भारत का जून का जीएसटी संग्रह साल-दर-साल के आधार पर 13.9 फीसदी बढ़कर 1.95 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसमें सबसे बड़ा योगदान आयात आईजीएसटी का रहा। आईजीएसटी में जून 2025 के मुकाबले 34.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। मई में यह वृद्धि 17.2 फीसदी की थी। घरेलू जीएसटी संग्रह में 6.5 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी हुई, जिससे पता चलता है कि कुल संग्रह में हुई जबरदस्त बढ़ोतरी का कारण घरेलू स्तर पर मूल्य वर्धन में व्यापक सुधार नहीं है। कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि यह पूंजीगत सामानों (कैपिटल गुड्स) और औद्योगिक कच्चे मालों (इंडस्ट्रियल इनपुट) के ज्यादा आयात को दर्शाता है। हालांकि, मई के पेट्रोलियम उत्पादों के व्यापार के आंकड़े और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में आठ प्रमुख उद्योगों (कोर इंडस्ट्रीज) के प्रदर्शन के आंकड़े कुछ अलग ही बात बताते हैं। जून का जीएसटी संग्रह मई के दौरान हुई आर्थिक गतिविधियों को दर्शाता है। इस मई में (साल-दर-साल के आधार पर) मूल्य के हिसाब से सामानों के आयात में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की वजह से 54 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि बाकी हिस्सा सोने का था, जिसकी वजह से 34 फीसदी की और बढ़ोतरी हुई। पिछले साल मई और इस साल मई के बीच सोने की कीमतों में लगभग 60 फीसदी की बढ़ोतरी से पता चलता है कि यह बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियों के बजाय मुश्किल समय में बचाव (हेजिंग) का नतीजा है। सोने के आयात पर अंकुश लगाने के लिए, सरकार ने 13 मई को इसके आयात शुल्क को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दी, जिससे मई में आयात जीएसटी संग्रह में बढ़ोतरी होने की संभावना है। इसी दौरान, फरवरी के आखिर से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया भी लगभग 6 फीसदी कमजोर हुआ। इसके साथ ही, माल ढुलाई के खर्च में बढ़ोतरी और मई में ऊंची वैश्विक कीमतों पर गैर-तेल आयात में 14.5 फीसदी की वृद्धि ने जून के कर आधार को अपने-आप बढ़ा दिया। इससे पता चलता है कि आयात जीएसटी में ज्यादातर बढ़ोतरी घरेलू उत्पादन में वृद्धि के बजाय आयातित मुद्रा स्फीति और मुद्रा के अवमूल्यन की वजह से हुई है, जो ज्यादा कीमतों के कारण हुई एक अवांछित बढ़ोतरी को दर्शाता है।
भारत के आठ मुख्य उद्योगों के प्रदर्शन को अगर देखें, तो घरेलू अर्थव्यवस्था कुछ धीमी नजर आती है। इन उद्योगों में वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में महज 2.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में इनमें लगभग 6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पादों, उर्वरकों और बिजली के क्षेत्र में उम्मीद के मुताबिक ही कमजोर वृद्धि देखी गई है। एचएसबीसी मैन्यूफैक्चरिंग पीएमआई का 54.2 का ताजा आंकड़ा भी कारखाना आधारित गतिविधियों में स्थिरता के साथ-साथ थोड़ी सुस्ती की ओर इशारा करता है, जो पिछले 13 महीनों में विस्तार की दूसरी सबसे कम दर है। ये आंकड़े ऐसे समय में आए हैं जब भारत एक एकीकृत गंतव्य-आधारित अप्रत्यक्ष कर के तौर पर जीएसटी के नौ साल पूरे कर रहा है। सरकार कर आधार में विस्तार का हवाला दे सकती है, जो 2017 में लगभग 66 लाख करदाताओं से बढ़कर आज 1.65 करोड़ से ज्यादा करदाताओं का हो गया है। यह बेहतर अनुपालन, अपेक्षाकृत ज्यादा औपचारिकीकरण और तेजी से रिफंड मिलने को दर्शाता है। हालांकि, इनपुट कर समंजन (टैक्स क्रेडिट), कानूनी विवाद और राजस्व साझाकरण में संघीय संतुलन जैसे मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। जीएसटी ने भारत के अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को मजबूत किया है। फिर भी, जून के आंकड़े इस बात की याद दिलाते हैं कि हालिया तेजी का एक बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर मूल्य वर्धन के बजाय आयातित मुद्रा स्फीति और रुपये के अवमूल्यन की वजह से आया है।
Source : https://www.thehindu.com/hindi/editorial/unwelcome-surge-on-the-buoyancy-in-gst-collections-hindi-editorial/article71177400.ece
